युद्ध और सशस्त्र संघर्ष का नुकसान केवल सैनिकों, नागरिकों, शहरों और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। जंगल जलते हैं, नदियां और भूजल प्रदूषित होते हैं, कृषि भूमि क्षतिग्रस्त होती है, वन्यजीवों के आवास नष्ट होते हैं और तेल, रसायन, धातु तथा युद्ध से निकलने वाला मलबा लंबे समय तक पर्यावरण में मौजूद रह सकता है। इसी गंभीर समस्या के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र हर वर्ष 6 नवंबर को International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict मनाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 नवंबर 2001 को इस दिवस की घोषणा की थी।
आज पर्यावरण और युद्ध का संबंध और अधिक जटिल हो गया है, क्योंकि संघर्ष से कमजोर हुए समाज जलवायु परिवर्तन, सूखा, बाढ़, जल संकट और खाद्य असुरक्षा का सामना करने में कम सक्षम होते हैं। दूसरी ओर, पर्यावरणीय क्षति स्वयं सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता को बढ़ा सकती है।

International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict (युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतर्राष्ट्रीय दिवस) क्या है?
यह दिवस युद्ध और सशस्त्र संघर्षों में प्राकृतिक संसाधनों तथा पर्यावरण के विनाश और दुरुपयोग के प्रति अंतरराष्ट्रीय चेतना पैदा करने का अवसर है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार युद्धों में पर्यावरण अक्सर एक “मौन पीड़ित” बन जाता है। कुएं प्रदूषित किए जा सकते हैं, फसलें जलाई जा सकती हैं, जंगल काटे जा सकते हैं, मिट्टी जहरीली हो सकती है और वन्यजीव मारे या विस्थापित हो सकते हैं।
इस दिवस का मूल संदेश यह है कि शांति केवल हथियारों की समाप्ति नहीं है; टिकाऊ शांति के लिए प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा भी जरूरी है।
युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतर्राष्ट्रीय दिवस कब मनाया जाता है?
यह दिवस हर वर्ष 6 नवंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य सरकारों, सैन्य संस्थानों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज को यह समझाना है कि युद्ध के दौरान पर्यावरण की सुरक्षा मानव सुरक्षा का भी हिस्सा है।
यह दिवस कब से आरंभ हुआ?
इस दिवस की औपचारिक शुरुआत वर्ष 2001 में हुई। इसके बाद पर्यावरण और सशस्त्र संघर्ष के संबंध को अंतरराष्ट्रीय कानून और नीतियों में अधिक व्यवस्थित रूप से शामिल करने की दिशा में काम आगे बढ़ा।
संयुक्त राष्ट्र के International Law Commission ने 2013 से “Protection of the environment in relation to armed conflicts” विषय पर व्यवस्थित कार्य किया और 2022 में 27 Draft Principles को अपनाया। इन्हें महासभा ने Resolution 77/104 के माध्यम से संज्ञान में लिया और व्यापक प्रसार के लिए प्रोत्साहित किया।
पर्यावरण के लिए युद्ध कितना बड़ा संकट बन रहे हैं?
युद्ध पर्यावरण के लिए कई स्तरों पर संकट पैदा करते हैं। बमबारी और विस्फोट से सीधे वन, कृषि भूमि, नदियां और शहरी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकते हैं। औद्योगिक प्रतिष्ठानों, तेल भंडारण केंद्रों और रासायनिक संयंत्रों को नुकसान होने पर जहरीले पदार्थ हवा, मिट्टी और जल में पहुंच सकते हैं।
शहरी युद्ध में समस्या और गंभीर हो जाती है। मलबा, धूल, जलती इमारतें, क्षतिग्रस्त सीवेज व्यवस्था और औद्योगिक पदार्थ जल तथा मिट्टी को प्रदूषित कर सकते हैं। ICRC के अनुसार युद्ध से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान स्वास्थ्य, आजीविका और दीर्घकालिक मानवीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
युद्ध से पर्यावरण को होने वाली प्रमुख क्षति
- जंगलों और प्राकृतिक आवासों का विनाश
- मिट्टी में भारी धातुओं और रसायनों का प्रवेश
- नदियों, झीलों और भूजल का प्रदूषण
- तेल एवं ईंधन का रिसाव
- कृषि भूमि की उत्पादकता में कमी
- वन्यजीवों का विस्थापन
- जैवविविधता का नुकसान
- जल एवं स्वच्छता infrastructure का विनाश
- युद्ध के मलबे और खतरनाक कचरे का बढ़ना
- बिना फटे विस्फोटकों से लंबे समय तक खतरा
बीते 15 वर्षों में युद्ध और पर्यावरणीय संकट बढ़ा है या कम हुआ है?
दुनिया के सभी युद्धों के पर्यावरणीय नुकसान को एक समान पद्धति से मापने वाला कोई एक वैश्विक 15-वर्षीय सूचकांक उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि वैश्विक पर्यावरणीय युद्ध-क्षति ठीक कितने प्रतिशत बढ़ी है।
लेकिन पिछले लगभग 15 वर्षों में उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आकलनों से यह स्पष्ट है कि कई संघर्ष क्षेत्रों में पर्यावरणीय नुकसान की प्रकृति अधिक जटिल और दीर्घकालिक होती दिखाई दे रही है। आधुनिक शहरी युद्ध, औद्योगिक और ऊर्जा ढांचे पर हमले, बड़े पैमाने पर विस्थापन तथा जलवायु परिवर्तन इस संकट को और जटिल बनाते हैं। ICRC भी बताता है कि संघर्ष, जलवायु जोखिम और पर्यावरणीय क्षरण एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा सकते हैं।
गाजा में UNEP के आकलनों ने मिट्टी, मीठे पानी, तटीय क्षेत्र, वायु गुणवत्ता और कचरा प्रबंधन पर गंभीर प्रभाव दर्ज किए हैं। 2025 के दूसरे आकलन में कुछ पर्यावरणीय क्षति के पुनर्वास में दशकों लगने की संभावना बताई गई।
यूक्रेन में भी UNEP ने युद्ध से जुड़ी बहुआयामी पर्यावरणीय क्षति और दीर्घकालिक “toxic legacy” के जोखिम की पहचान की थी।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि पर्यावरणीय नुकसान समाप्त नहीं हुआ है; अनेक आधुनिक संघर्षों में इसके स्वरूप, फैलाव और दीर्घकालिक प्रभाव अधिक गंभीर और जटिल हो रहे हैं।
पर्यावरणीय नुकसान बढ़ने के लिए कौन-सी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं?
इसके पीछे कई परिस्थितियां एक साथ काम करती हैं।
पहली, युद्ध अब केवल खुले मैदानों तक सीमित नहीं हैं। आबादी वाले शहरों में संघर्ष होने से पानी, बिजली, सीवेज, अस्पताल और औद्योगिक ढांचा प्रभावित होता है।
दूसरी, तेल, गैस, रासायनिक उद्योग और ऊर्जा अवसंरचना पर नुकसान से आग, धुआं और प्रदूषण का खतरा बढ़ता है।
तीसरी, विस्थापित आबादी भोजन, ईंधन और आश्रय के लिए स्थानीय जंगलों, जल स्रोतों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
चौथी, युद्ध के दौरान पर्यावरणीय निगरानी और प्रशासन कमजोर हो जाता है। इससे अवैध कटाई, अवैध खनन, कचरा प्रबंधन की समस्या और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग बढ़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र ने यह भी रेखांकित किया है कि पिछले छह दशकों में कम-से-कम 40 प्रतिशत आंतरिक संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों के शोषण से जुड़े रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े संघर्षों के दोबारा भड़कने की संभावना अधिक पाई गई है।
युद्ध से मानव जीवन किस तरह के संकट में घिर सकता है?
पर्यावरणीय क्षति अंततः मानव जीवन का संकट बन जाती है।
यदि किसी क्षेत्र का पानी प्रदूषित हो जाए तो पीने के पानी और स्वच्छता का संकट पैदा हो सकता है। मिट्टी में जहरीले पदार्थ पहुंचने पर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। वायु प्रदूषण से श्वसन संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।
लंबे समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है। दूषित जल, क्षतिग्रस्त कृषि भूमि और नष्ट हुए पारिस्थितिकी तंत्र स्थानीय अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं। विस्थापन बढ़ सकता है और लोगों की आजीविका के साधन खत्म हो सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और बढ़ाता है। संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में संस्थागत क्षमता पहले से कमजोर होती है, इसलिए सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी और अन्य जलवायु जोखिमों से उबरना अधिक कठिन हो जाता है।
युद्ध और पर्यावरण: प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों की स्थिति क्या बताती है?
| क्षेत्र/देश | पर्यावरणीय जोखिम | प्रमुख प्रभाव |
| गाजा | अत्यधिक शहरी संघर्ष | मलबा, जल एवं मिट्टी प्रदूषण, सीवेज संकट, तटीय पारिस्थितिकी पर दबाव |
| यूक्रेन | औद्योगिक एवं व्यापक युद्ध क्षेत्र | प्रदूषण, क्षतिग्रस्त औद्योगिक ढांचा, कृषि भूमि और जल संसाधनों पर खतरा |
| मध्य पूर्व | ऊर्जा एवं तेल अवसंरचना | तेल आग, धुआं, वायु प्रदूषण और संभावित मिट्टी/जल प्रदूषण |
| अफ्रीका के संघर्ष क्षेत्र | संसाधन एवं जलवायु दबाव | विस्थापन, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव, जल एवं खाद्य असुरक्षा |
| शहरी संघर्ष क्षेत्र | घनी आबादी | मलबा, धूल, सीवेज, जल और वायु प्रदूषण |
| कृषि क्षेत्र | भूमि एवं जल पर निर्भरता | फसल नुकसान, भूमि प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा का संकट |
गाजा, यूक्रेन और मध्य पूर्व से संबंधित पर्यावरणीय प्रभावों पर UNEP ने अलग-अलग आकलन और वक्तव्य प्रकाशित किए हैं।
क्या पर्यावरणीय नुकसान युद्ध समाप्त होने के बाद भी रहता है?
हाँ। यही इस संकट का सबसे गंभीर पक्ष है।
युद्ध समाप्त होने के बाद भी बिना फटे विस्फोटक, भारी धातुएं, रसायन, ईंधन अवशेष, मलबा, धूल और दूषित जल लंबे समय तक समस्या बने रह सकते हैं। इनके कारण कृषि भूमि, जल स्रोत और प्राकृतिक आवासों की बहाली कठिन हो सकती है।
2025 में UNEP और ICRC से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि युद्ध का पर्यावरणीय प्रभाव पानी, मिट्टी और वायु को प्रभावित करने के साथ-साथ स्वास्थ्य, आजीविका और जैवविविधता पर लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है।
इसलिए युद्ध के बाद पुनर्निर्माण केवल इमारतों और सड़कों का निर्माण नहीं होना चाहिए। पर्यावरणीय पुनर्बहाली भी पुनर्निर्माण का अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए।
पर्यावरण की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या प्रयास हो रहे हैं?
इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थागत प्रयास लगातार विकसित हुए हैं।
International Law Commission ने 2022 में सशस्त्र संघर्षों के संदर्भ में पर्यावरण संरक्षण के लिए 27 Draft Principles अपनाए। इनमें संघर्ष से पहले, संघर्ष के दौरान, कब्जे की स्थिति और संघर्ष के बाद पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सिद्धांत शामिल हैं।
ICRC ने प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अपने 2020 Guidelines को विकसित किया है। इनमें सैन्य प्रशिक्षण, राष्ट्रीय कानून, सैन्य नियमावली और संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्रों की पहचान जैसे उपायों पर जोर दिया गया है।
2026 में ICRC ने इन नियमों को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने में सहायता के लिए Implementation Guidance भी प्रकाशित की, जिसमें राज्यों के लिए व्यावहारिक उपाय और अनुपालन संबंधी चेकलिस्ट शामिल हैं।
UNEP संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में पर्यावरणीय आकलन, प्रदूषण नियंत्रण और पुनर्बहाली के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान करता है।
युद्ध में पर्यावरण को बचाने के लिए आगे क्या किया जाना चाहिए?
सबसे पहले पर्यावरण को सैन्य और मानवीय सुरक्षा का हिस्सा माना जाना चाहिए। महत्वपूर्ण जल स्रोतों, जंगलों, आर्द्रभूमियों और अत्यधिक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों की पहचान पहले से की जानी चाहिए।
दूसरा, सैन्य अभियानों में संभावित पर्यावरणीय नुकसान का आकलन करने की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
तीसरा, संघर्ष के बाद Environmental Impact Assessment, Toxic Waste Management और Ecosystem Restoration को पुनर्निर्माण योजनाओं में शामिल करना चाहिए।
चौथा, जलवायु परिवर्तन और संघर्ष को अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखने के बजाय उनके संबंध को समझना होगा। ICRC के अनुसार संघर्षग्रस्त समुदायों की जलवायु-अनुकूलन क्षमता अक्सर कमजोर होती है और पर्यावरणीय क्षति इस कमजोरी को और बढ़ा सकती है।
Summary: युद्ध से प्रकृति की रक्षा क्यों जरूरी है?
युद्ध का पर्यावरणीय नुकसान सीमाओं में बंद नहीं रहता। प्रदूषित नदी सीमा पार जा सकती है, हवा में फैले प्रदूषक दूर तक पहुंच सकते हैं और नष्ट हुआ पारिस्थितिकी तंत्र स्थानीय खाद्य एवं जल सुरक्षा को वर्षों तक प्रभावित कर सकता है।
International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict हमें यह याद दिलाता है
कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा शांति निर्माण का हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार टिकाऊ शांति के लिए उन प्राकृतिक
संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्रों की सुरक्षा आवश्यक है जिन पर समाज निर्भर करते हैं।
आज की चुनौती केवल युद्ध रोकने की नहीं, बल्कि युद्ध से प्रभावित
प्रकृति को बचाने और पुनर्जीवित करने की भी है। आने वाले वर्षों में
पर्यावरणीय सुरक्षा, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और शांति निर्माण को एक साथ देखने की आवश्यकता और बढ़ेगी।
FAQ: युद्ध और पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न
1. International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict कब मनाया जाता है?
यह दिवस हर वर्ष 6 नवंबर को मनाया जाता है।
2. यह अंतर्राष्ट्रीय दिवस कब शुरू हुआ?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 6 नवंबर को यह दिवस घोषित किया था।
3. युद्ध पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
युद्ध से जंगल, मिट्टी, जल स्रोत, कृषि भूमि और वन्यजीव आवास प्रभावित हो सकते हैं।
तेल, रसायन, मलबा और विस्फोटकों के अवशेष लंबे समय तक प्रदूषण पैदा कर सकते हैं।
4. क्या युद्ध से जल प्रदूषण बढ़ सकता है?
हाँ। जल आपूर्ति और सीवेज व्यवस्था के नष्ट होने, औद्योगिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचने तथा
ईंधन और रसायनों के रिसाव से जल प्रदूषण का खतरा बढ़ सकता है।
5. क्या युद्ध का पर्यावरणीय प्रभाव युद्ध समाप्त होने के बाद भी रहता है?
हाँ। बिना फटे विस्फोटक, दूषित मिट्टी, मलबा, रसायन और क्षतिग्रस्त जल प्रणालियां संघर्ष समाप्त
होने के बाद भी स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।
6. क्या जलवायु परिवर्तन और युद्ध एक-दूसरे से जुड़े हैं?
हाँ। जलवायु परिवर्तन सूखा, बाढ़ और खाद्य-पानी की असुरक्षा बढ़ा सकता है, जबकि युद्ध पर्यावरणीय क्षरण
और लोगों की अनुकूलन क्षमता को कमजोर कर सकता है।
7. युद्ध के दौरान पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम हैं?
हाँ। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून में प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा से
संबंधित नियम हैं। International Law Commission ने 2022 में
सशस्त्र संघर्षों से संबंधित पर्यावरण संरक्षण के 27 Draft Principles भी अपनाए।
References
- United Nations — International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict.
- United Nations International Law Commission — Protection of the Environment in Relation to Armed Conflicts.
- UNEP — Environmental Impact of the Conflict in Gaza.
- UNEP — Environmental Impact of the Conflict in Ukraine.
- ICRC — Guidelines on Protection of Natural Environment in Armed Conflict.
- ICRC — Climate Change, Armed Conflict and Other Situations of Violence.
- ICRC — Protection of the Natural Environment in Armed Conflict: Implementation Guidance, 2026.
Disclaimer
यह आलेख संयुक्त राष्ट्र, UNEP, International Law Commission और
ICRC जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा प्रकाशित उपलब्ध स्रोतों के
आधार पर तैयार किया गया है। युद्ध क्षेत्रों में परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं तथा कई क्षेत्रों में सुरक्षा
कारणों से पर्यावरणीय क्षति का पूरा वैज्ञानिक आकलन तुरंत संभव नहीं होता।
इसलिए किसी विशेष क्षेत्र की क्षति के आंकड़ों को अंतिम आंकड़ा मानने से पहले संबंधित आधिकारिक रिपोर्ट देखना आवश्यक है।
यह लेख जागरूकता और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है।
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