प्रशांत महासागर में तेजी से गर्म हो रहा समुद्री जल 2026-27 के दौरान एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो घटना का संकेत दे रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO), अमेरिका की राष्ट्रीय समुद्री एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) और कोलंबिया विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRI) के आकलन बताते हैं कि वर्तमान अल नीनो असाधारण रूप से मजबूत हो रहा है। इसके प्रभाव से दुनिया के कई हिस्सों में बारिश, सूखा, तापमान, समुद्री तूफानों और कृषि उत्पादन के सामान्य पैटर्न बदल सकते हैं।
NOAA के 8 अक्टूबर 2026 के आकलन के अनुसार, Niño-3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से लगभग 2.1°C अधिक था। अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली अल नीनो जैसी घटना की आशंका 83 प्रतिशत बताई गई। IRI के 19 अक्टूबर के आकलन में साप्ताहिक Niño-3.4 विसंगति लगभग +3.3°C तक पहुंचने का उल्लेख है। हालांकि, “सुपर अल नीनो” कोई आधिकारिक अलग वैज्ञानिक श्रेणी नहीं है। वैज्ञानिक सामान्यतः इसकी तीव्रता को कमजोर, मध्यम, मजबूत और बहुत मजबूत जैसे स्तरों में व्यक्त करते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि अल नीनो का संबंध अक्सर कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून, अधिक गर्मी और वर्षा के असमान वितरण से देखा गया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत में निश्चित रूप से सूखा पड़ेगा। हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), मानसूनी परिसंचरण, मैडेन-जूलियन दोलन (MJO), हिमालयी पश्चिमी विक्षोभ और क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां इसके प्रभाव को बदल सकती हैं। इसलिए 2026-27 को जल, कृषि, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन की दृष्टि से तैयारी का समय मानना अधिक उचित होगा।

1. Super El Niño (सुपर अल नीनो) क्या है?
सुपर अल नीनो उस स्थिति के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला लोकप्रिय शब्द है, जब प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है और इस गर्मी के साथ वातावरण का दबाव, हवाओं तथा वर्षा का वैश्विक पैटर्न भी बड़े स्तर पर बदलने लगता है।
अल नीनो, ENSO यानी El Niño-Southern Oscillation का गर्म चरण है। यह एक प्राकृतिक महासागरीय-वायुमंडलीय प्रक्रिया है। सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म सतही जल को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। इसके कारण पश्चिमी प्रशांत में समुद्र अपेक्षाकृत गर्म और पूर्वी प्रशांत में ठंडा रहता है।
जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो गर्म जल पूर्वी और मध्य प्रशांत की ओर फैलने लगता है। समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है और वातावरण में संवहन, बादलों तथा वर्षा के क्षेत्र खिसकने लगते हैं। इसी बदलाव को अल नीनो की प्रक्रिया कहा जाता है।
जब समुद्र का तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाए और समुद्र-वायुमंडल की यह परस्पर प्रतिक्रिया लंबे समय तक मजबूत बनी रहे, तो घटना को बहुत मजबूत अल नीनो कहा जा सकता है। मीडिया में इसी स्थिति को कई बार “सुपर अल नीनो” कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य: भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने 30 जुलाई 2026 को संसद में स्पष्ट किया था कि WMO या IMD द्वारा “Super El Niño” नाम की कोई अलग आधिकारिक श्रेणी निर्धारित नहीं है। अल नीनो की तीव्रता समुद्र की सतह के तापमान में विसंगति के आधार पर कमजोर, मध्यम, मजबूत और बहुत मजबूत श्रेणियों में समझी जाती है।
2. अल नीनो को कैसे समझा जा सकता है?
इसे समझने का सरल तरीका है—प्रशांत महासागर के पानी और उसके ऊपर बहने वाली हवाओं के व्यवहार को समझना।
सामान्य स्थिति में व्यापारिक हवाएं गर्म समुद्री जल को पश्चिमी प्रशांत की ओर ले जाती हैं। पूर्वी प्रशांत में पेरू और इक्वाडोर के तट के आसपास गहरे समुद्र का अपेक्षाकृत ठंडा जल ऊपर आता रहता है। इस प्रक्रिया को अपवेलिंग (Upwelling) कहते हैं। इससे समुद्र की सतह का तापमान नियंत्रित रहता है और समुद्री पारिस्थितिकी को पोषक तत्व मिलते हैं।
अल नीनो के दौरान व्यापारिक हवाएं कमजोर हो जाती हैं। पूर्वी प्रशांत में ठंडे जल का ऊपर आना कम हो सकता है और गर्म जल पूर्व की ओर फैलता है। समुद्र की सतह गर्म होने से बादलों और वर्षा का मुख्य क्षेत्र भी पूर्व की ओर खिसकता है। इससे दुनिया के दूसरे हिस्सों में हवा और वर्षा का संतुलन बदल जाता है।
इसे एक उदाहरण से समझिए। यदि प्रशांत महासागर के एक हिस्से में सामान्य से अधिक गर्मी पैदा होती है, तो वहां हवा ऊपर उठने और बादल बनने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। दूसरी ओर, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में हवा के नीचे उतरने और वर्षा घटने की परिस्थितियां बन सकती हैं। इस तरह समुद्र में पैदा हुआ बदलाव हजारों किलोमीटर दूर मौसम को प्रभावित कर सकता है।
अल नीनो की तीव्रता कैसे मापी जाती है?
वैज्ञानिक Niño-3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान की विसंगति मापते हैं। यह मध्य-पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का एक निर्धारित क्षेत्र है। सामान्यतः तीन महीने के औसत तापमान में +0.5°C या उससे अधिक की विसंगति अल नीनो परिस्थितियों का संकेत देती है, बशर्ते यह निर्धारित अवधि तक बनी रहे और वायुमंडलीय संकेत भी इसकी पुष्टि करें।
परंपरागत Oceanic Niño Index (ONI) और Relative Oceanic Niño Index (RONI) जैसे सूचकांकों का उपयोग किया जाता है। RONI व्यापक उष्णकटिबंधीय महासागर के औसत तापमान की तुलना को भी ध्यान में रखता है। इसलिए अलग-अलग सूचकांकों के आंकड़ों को सीधे एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
2026 में अल नीनो की स्थिति कितनी गंभीर है?
NOAA के Climate Prediction Center ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी ENSO Diagnostic Discussion में बताया कि अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है। Niño-3.4 सूचकांक लगभग +2.1°C, Niño-3 लगभग +3.0°C और Niño-1+2 लगभग +3.9°C दर्ज किया गया। पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत के कुछ हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 4°C से अधिक गर्म था।
NOAA ने अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान 1950 के बाद दर्ज घटनाओं से भी अधिक शक्तिशाली घटना की संभावना 83 प्रतिशत बताई। जनवरी-मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत अल नीनो बने रहने की संभावना भी 83 प्रतिशत से अधिक बताई गई।
IRI के 19 अक्टूबर 2026 के आकलन में Niño-3.4 का साप्ताहिक मान लगभग +3.3°C बताया गया। उसके बहु-मॉडल समूह के सभी 27 मॉडल अक्टूबर-दिसंबर 2026 से दिसंबर-फरवरी 2026-27 तक बहुत मजबूत अल नीनो की ओर संकेत कर रहे थे। हालांकि, मॉडल पूर्वानुमान और वास्तविक रूप से दर्ज तीन-महीने के सूचकांक में अंतर हो सकता है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2026-27 की घटना अत्यंत मजबूत हो सकती है। लेकिन इसे इतिहास की सबसे बड़ी घटना घोषित करने के लिए अंतिम और तुलनात्मक अवलोकन आवश्यक होंगे।
3. यह कितना बड़ा संकट है और दुनिया के मौसम को कैसे बदल सकता है?
अल नीनो अपने आप में कोई तूफान या एक दिन में आने वाली आपदा नहीं है। यह महासागर और वातावरण के बीच लंबे समय तक चलने वाला बदलाव है। इसका संकट इसलिए बड़ा है, क्योंकि यह कई महीनों तक वर्षा, तापमान और मौसमी गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
बहुत मजबूत अल नीनो के दौरान कुछ क्षेत्रों में सूखे की आशंका बढ़ती है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। कुछ देशों में गर्मी और जंगलों की आग का जोखिम बढ़ सकता है। समुद्री पारिस्थितिकी, मत्स्य उत्पादन, कृषि, जलविद्युत और खाद्य कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
इसका एक और गंभीर पहलू यह है कि अल नीनो के दौरान वैश्विक औसत तापमान में अस्थायी वृद्धि हो सकती है। पहले से गर्म हो रही पृथ्वी पर इसका प्रभाव अधिक स्पष्ट हो सकता है। हालांकि, अल नीनो स्वयं जलवायु परिवर्तन नहीं है। यह प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जबकि मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग दीर्घकालिक तापवृद्धि का प्रमुख कारण है। दोनों एक साथ सक्रिय होने पर गर्मी के रिकॉर्ड और चरम तापमान की स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है।
क्या अल नीनो से दुनिया में खाद्य संकट पैदा हो सकता है?
इसकी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे निश्चित परिणाम नहीं मानना चाहिए। यदि प्रमुख कृषि उत्पादक क्षेत्रों में एक ही समय पर सूखा, अत्यधिक गर्मी या बाढ़ आती है, तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे अनाज, तिलहन, दालों, कॉफी, कोको और अन्य कृषि उत्पादों की आपूर्ति तथा कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
कृषि संकट की गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि मौसम का प्रभाव किन फसलों के महत्वपूर्ण विकास चरणों में पड़ता है, सिंचाई की सुविधा कितनी उपलब्ध है, किसानों के पास बीज और वित्तीय संसाधन कितने हैं तथा सरकारों की खाद्य भंडारण और आयात-निर्यात नीति कैसी है।
4. दुनिया के किन देशों के लिए अल नीनो सर्वाधिक संकट बन सकता है?
अल नीनो का प्रभाव हर देश में एक जैसा नहीं होता। इसका असर भौगोलिक स्थिति, समुद्र से दूरी, स्थानीय मानसूनी व्यवस्था, कृषि पद्धति और मौसम के मौसम-विशेष पर निर्भर करता है।
1. पेरू और इक्वाडोर: अत्यधिक बारिश और बाढ़ का जोखिम
दक्षिण अमेरिका के प्रशांत तट पर स्थित पेरू और इक्वाडोर अल नीनो के प्रत्यक्ष प्रभाव वाले देशों में हैं। समुद्र का गर्म होना तटीय क्षेत्रों में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की परिस्थितियां पैदा कर सकता है। इससे सड़क, पुल, आवास, कृषि और मत्स्य उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।
विशेष रूप से पेरू के उत्तरी तटीय क्षेत्रों में अल नीनो के दौरान वर्षा का पैटर्न बहुत बदल सकता है। हालांकि, हर घटना में बारिश की मात्रा और प्रभावित क्षेत्र समान नहीं होते।
2. इंडोनेशिया: सूखा, जंगलों की आग और जल संकट
इंडोनेशिया में अल नीनो के दौरान वर्षा कम होने और शुष्क मौसम लंबा खिंचने का जोखिम बढ़ सकता है। पीटलैंड और जंगलों में आग लगने की आशंका बढ़ती है। आग से निकलने वाला धुआं आसपास के देशों तक पहुंच सकता है और स्वास्थ्य तथा वायु गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।
3. ऑस्ट्रेलिया: सूखे और कृषि जोखिम
ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में अल नीनो के दौरान गर्म और शुष्क परिस्थितियों की आशंका बढ़ सकती है। इससे गेहूं, पशुपालन, जल उपलब्धता और जंगलों में आग के जोखिम पर असर पड़ सकता है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के सभी हिस्सों में एक समान प्रभाव नहीं होता।
4. दक्षिणी अफ्रीका: खाद्य सुरक्षा की चुनौती
दक्षिणी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अल नीनो के दौरान वर्षा कम होने का ऐतिहासिक संबंध देखा गया है। जाम्बिया, जिम्बाब्वे, मलावी, मोजाम्बिक और दक्षिण अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में मक्का जैसी वर्षा-आधारित फसलों पर जोखिम बढ़ सकता है। यदि सूखा लंबे समय तक रहे, तो ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
5. भारत: मानसून और कृषि पर दबाव
भारत में अल नीनो का संबंध कई बार कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून से देखा गया है। इससे वर्षा की कमी, लंबे शुष्क अंतराल, जलाशयों में कम पानी और खरीफ फसलों पर दबाव जैसी स्थितियां बन सकती हैं। लेकिन भारत में मानसून पर हिंद महासागर द्विध्रुव, स्थानीय समुद्री तापमान और अन्य मौसमी प्रणालियों का भी प्रभाव होता है।
6. मध्य अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र
मध्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में अल नीनो के दौरान सूखे और कृषि जल संकट का जोखिम बढ़ सकता है। इससे मक्का, बीन्स और अन्य वर्षा-आधारित फसलों पर असर पड़ सकता है। कैरेबियाई क्षेत्र में अटलांटिक तूफान गतिविधि भी प्रभावित हो सकती है, लेकिन हर वर्ष और हर द्वीप के लिए इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता।
7. ब्राजील और दक्षिण अमेरिका के अन्य हिस्से
दक्षिणी ब्राजील और आसपास के क्षेत्रों में कुछ अल नीनो घटनाओं के दौरान अधिक बारिश और बाढ़ का जोखिम बढ़ा है, जबकि उत्तरी और अमेजन क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति बन सकती है। यह अंतर बताता है कि एक ही महासागरीय घटना अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में विपरीत प्रभाव पैदा कर सकती है।
5. भारत पर अल नीनो का क्या असर होने वाला है?
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 2026-27 का अत्यंत मजबूत अल नीनो देश में मानसून को कमजोर करेगा और कृषि उत्पादन को प्रभावित करेगा?
ऐतिहासिक रूप से भारत में कई अल नीनो वर्षों के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रहा है। इसका कारण प्रशांत महासागर में समुद्र-वायुमंडल के बदलाव और भारतीय मानसूनी परिसंचरण के बीच संबंध है। लेकिन यह संबंध पूर्ण रूप से निश्चित नहीं है। कुछ अल नीनो वर्षों में भी भारत में सामान्य या अपेक्षाकृत बेहतर बारिश हुई है।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने 30 जुलाई 2026 को संसद में बताया था कि IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अल नीनो परिस्थितियों के विकसित होने का अनुमान लगाया था। जून 2026 में ये परिस्थितियां कमजोर थीं और जुलाई में मध्यम स्तर तक मजबूत हुई थीं। मंत्रालय ने यह भी कहा था कि अक्टूबर-दिसंबर 2026 में अल नीनो और मजबूत होकर बहुत मजबूत श्रेणी तक पहुंच सकता है। इसके वास्तविक प्रभाव अन्य महासागरीय और वायुमंडलीय स्थितियों पर निर्भर करेंगे।
क्या भारत में 2027 का मानसून कमजोर रह सकता है?
अल नीनो की मौजूदगी 2027 के मानसून के लिए जोखिम बढ़ाती है, लेकिन अभी से यह कहना सही नहीं होगा कि पूरे देश में सूखा पड़ेगा या मानसून निश्चित रूप से कमजोर रहेगा। मानसून के वास्तविक पूर्वानुमान के लिए IMD के मौसमी आकलन और बाद के अपडेट अधिक महत्वपूर्ण होंगे।
भारत के मानसून को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों में हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), Madden-Julian Oscillation (MJO), हिमालयी और पश्चिमी प्रशांत की स्थितियां तथा स्थानीय समुद्री तापमान शामिल हैं। सकारात्मक IOD कुछ परिस्थितियों में अल नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को कम कर सकता है। WMO ने सितंबर-नवंबर 2026 के लिए सकारात्मक IOD विकसित होने का संकेत भी दिया था।
भारत के किन राज्यों और क्षेत्रों पर अधिक असर पड़ सकता है?
अल नीनो का असर किसी एक राज्य तक सीमित नहीं होता। वर्षा की कमी या अनियमितता का जोखिम उन क्षेत्रों में अधिक गंभीर हो सकता है जहां खेती मुख्य रूप से मानसूनी बारिश पर निर्भर है और सिंचाई के साधन सीमित हैं।
मध्य भारत, महाराष्ट्र के वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्र, कर्नाटक के कुछ हिस्से, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश के आंतरिक क्षेत्र, राजस्थान, बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में वर्षा की कमी होने पर कृषि तथा जल उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। यह संभावित जोखिम का भौगोलिक आकलन है, किसी राज्य के लिए घोषित मौसम चेतावनी नहीं।
खरीफ फसलों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, अरहर, मूंग, उड़द और मूंगफली जैसी खरीफ फसलों की बुवाई और विकास मानसूनी बारिश से जुड़े होते हैं। यदि बारिश देर से आए, बीच में लंबे शुष्क अंतराल हों या फसल के महत्वपूर्ण चरण में पानी की कमी हो, तो उत्पादन घट सकता है।
धान की रोपाई प्रभावित हो सकती है। सोयाबीन और मक्का में फूल आने तथा दाना बनने के समय नमी की कमी नुकसान पहुंचा सकती है। दालों में भी फूल और फलियां बनने के समय जल तनाव से उत्पादन घट सकता है।
रबी फसलों पर क्या असर हो सकता है?
यदि मानसून कमजोर रहता है, तो जलाशयों, तालाबों और भूजल के पुनर्भरण पर असर पड़ सकता है। इससे रबी सीजन में गेहूं, चना, सरसों और अन्य फसलों की सिंचाई चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
दूसरी ओर, बहुत गर्म सर्दी या तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव गेहूं की फसल के लिए नुकसानदेह हो सकता है। हालांकि, भारत में रबी फसलों पर असर स्थानीय तापमान, पश्चिमी विक्षोभ, सिंचाई और बुवाई के समय पर भी निर्भर करेगा।
क्या भारत में गर्मी और लू का खतरा बढ़ सकता है?
अल नीनो के दौरान वैश्विक तापमान में वृद्धि की संभावना रहती है। भारत में भी कुछ मौसमों में सामान्य से अधिक गर्मी की परिस्थितियां बन सकती हैं। यदि वर्षा कम हो और मिट्टी में नमी घटे, तो सतही तापमान बढ़ सकता है। इससे लू, बिजली की मांग, पेयजल की आवश्यकता और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।
हालांकि, किसी विशेष शहर या राज्य में लू की चेतावनी केवल अल नीनो के आधार पर तय नहीं की जा सकती। इसके लिए IMD के तापमान पूर्वानुमान और स्थानीय मौसम चेतावनी देखना आवश्यक है।
क्या खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं?
यदि सूखा या गर्मी प्रमुख कृषि क्षेत्रों में उत्पादन को प्रभावित करती है, तो अनाज, दालों, तिलहन और सब्जियों की आपूर्ति पर दबाव आ सकता है। इससे बाजार भाव बढ़ने की आशंका रहती है। लेकिन कीमतों का निर्धारण केवल मौसम से नहीं होता। सरकारी खरीद, बफर स्टॉक, आयात, निर्यात नीति, परिवहन और बाजार मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
6. भारत की भौगोलिक परिस्थितियां अल नीनो के प्रभाव को कैसे बदलती हैं?
भारत की भौगोलिक स्थिति विविध है। देश के पश्चिम में शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र हैं, मध्य भारत में वर्षा-आधारित कृषि का बड़ा हिस्सा है, दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार है और उत्तर में हिमालयी क्षेत्र। इस विविधता के कारण एक ही अल नीनो घटना का असर सभी क्षेत्रों में समान नहीं हो सकता।
पश्चिमी राजस्थान और गुजरात के शुष्क हिस्सों में कम बारिश जल संकट को बढ़ा सकती है। बुंदेलखंड और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में वर्षा में लंबा अंतराल खेती और पेयजल दोनों पर असर डाल सकता है। दक्कन के पठारी क्षेत्रों में मिट्टी की नमी और जलाशयों की स्थिति महत्वपूर्ण होगी। हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा, बर्फबारी और पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका अलग होती है।
भारत की मानसूनी व्यवस्था अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से नमी प्राप्त करती है। बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र और मानसूनी अवदाब कई बार मध्य तथा उत्तर भारत में बारिश पहुंचाते हैं। इसलिए अल नीनो के बावजूद क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां वर्षा का वितरण बदल सकती हैं।
7. अल नीनो से बचाव और सुरक्षित रहने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
अल नीनो को रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह प्राकृतिक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है। लेकिन इसके संभावित नुकसान को कम करने के लिए समय रहते तैयारी की जा सकती है। वैज्ञानिक निगरानी, मौसमी पूर्वानुमान, जल प्रबंधन, कृषि सलाह और आपदा तैयारी इसमें महत्वपूर्ण हैं।
मौसम एजेंसियां क्या कर रही हैं?
WMO, NOAA, IMD और अन्य राष्ट्रीय मौसम एजेंसियां समुद्र की सतह के तापमान, समुद्र के भीतर तापमान, व्यापारिक हवाओं, वायुमंडलीय दबाव और वर्षा के पैटर्न की निगरानी करती हैं। उपग्रहों, समुद्री बुआ, मौसम केंद्रों और कंप्यूटर मॉडल की मदद से अल नीनो की स्थिति और उसके संभावित प्रभावों का अनुमान लगाया जाता है।
WMO ने 3 सितंबर 2026 को बताया कि अल नीनो 2027 की शुरुआत तक बने रहने की लगभग 100 प्रतिशत संभावना है और इसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में बारिश तथा तापमान के पैटर्न बदल सकते हैं। संगठन ने देशों को पूर्व चेतावनी और तैयारी बढ़ाने की सलाह दी।
भारत में कौन-सी तैयारियां जरूरी हैं?
भारत में IMD मौसम पूर्वानुमान, विस्तारित अवधि के पूर्वानुमान और प्रभाव-आधारित चेतावनियां जारी करता है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार, IMD राज्य सरकारों, जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन संस्थाओं को नियमित मौसम संबंधी जानकारी देता है।
कृषि क्षेत्र में ICAR, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों की सलाह महत्वपूर्ण होगी। किसानों को स्थानीय मौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार बुवाई, फसल चयन, सिंचाई और कीट प्रबंधन के निर्णय लेने चाहिए।
किसानों के लिए कौन-से उपाय उपयोगी हो सकते हैं?
- स्थानीय कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह के अनुसार ही फसल तथा किस्म का चयन करें।
- कम अवधि में तैयार होने वाली और सूखा सहन करने वाली उपयुक्त किस्मों की जानकारी लें।
- खेतों में वर्षा जल संचयन, मेड़बंदी और खेत-तालाब जैसी संरचनाओं को बढ़ावा दें।
- मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाएं, ताकि नमी धारण करने की क्षमता बेहतर हो।
- ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का उपयोग जहां व्यावहारिक हो, वहां बढ़ाएं।
- बुवाई के समय और बीज की मात्रा पर स्थानीय कृषि सलाह का पालन करें।
- फसल बीमा और मौसम आधारित कृषि सलाह सेवाओं की जानकारी रखें।
आम नागरिक क्या सावधानियां बरतें?
गर्मी और जल संकट की स्थिति में पेयजल का विवेकपूर्ण उपयोग करें। लू की चेतावनी के दौरान दोपहर में अनावश्यक बाहर निकलने से बचें, पर्याप्त पानी पिएं और बुजुर्गों, बच्चों तथा बाहर काम करने वाले लोगों का विशेष ध्यान रखें। स्थानीय प्रशासन की जलापूर्ति और मौसम संबंधी सलाह का पालन करें।
जंगलों और सूखे घास वाले क्षेत्रों में आग से बचाव के नियम अपनाएं। बिजली और पानी की बचत करें तथा जलाशयों और स्थानीय जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाएं।
8. क्या अल नीनो जलवायु परिवर्तन का परिणाम है?
नहीं। अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है और यह मानवजनित जलवायु
परिवर्तन से अलग प्रक्रिया है। हालांकि, दोनों के प्रभाव एक साथ दिखाई दे सकते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी का औसत तापमान पहले ही बढ़ रहा है।
जब अत्यंत मजबूत अल नीनो वैश्विक तापमान में अतिरिक्त अस्थायी बढ़ोतरी
करता है, तो कुछ क्षेत्रों में गर्मी के रिकॉर्ड टूटने की संभावना बढ़ सकती है।
इसी तरह गर्म वातावरण में भारी वर्षा की घटनाओं की तीव्रता भी
बढ़ सकती है, क्योंकि गर्म हवा अधिक नमी धारण कर सकती है।
इसलिए वर्तमान घटना को समझते समय प्राकृतिक ENSO चक्र और दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन—दोनों को ध्यान में रखना चाहिए।
9. क्या 2026-27 का अल नीनो इतिहास की सबसे शक्तिशाली घटना होगा?
अभी इसे निश्चित रूप से इतिहास की सबसे शक्तिशाली घटना कहना जल्दबाजी होगी। NOAA के अक्टूबर 2026 आकलन में अक्टूबर-दिसंबर के दौरान ऐतिहासिक रूप से बहुत शक्तिशाली घटना की संभावना 83 प्रतिशत बताई गई है। IRI के अक्टूबर आकलन में भी बहुत मजबूत घटना के संकेत मिले हैं।
इतिहास में 1982-83, 1997-98 और 2015-16 की घटनाएं
अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो के रूप में जानी जाती हैं। वर्तमान घटना की तुलना
इनसे करने के लिए समान सूचकांक, समान आधार अवधि और तीन-महीने के औसत आंकड़ों का उपयोग करना होगा।
अलग-अलग रिपोर्टों में ONI, RONI और साप्ताहिक Niño-3.4 जैसे अलग
माप होने के कारण केवल एक आंकड़े के आधार पर रिकॉर्ड का दावा करना उचित नहीं है।
10. आगे क्या देखना जरूरी है?
अगले कुछ महीनों में समुद्र की सतह के तापमान, व्यापारिक हवाओं, प्रशांत महासागर के
वायुमंडलीय दबाव और भारतीय महासागर की स्थिति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
भारत के लिए विशेष रूप से 2027 के दक्षिण-पश्चिम मानसून से पहले IMD के
मौसमी पूर्वानुमान, IOD की स्थिति और मानसून के शुरुआती संकेत महत्वपूर्ण होंगे।
अल नीनो का मजबूत होना जोखिम बढ़ाता है, लेकिन वास्तविक नुकसान इस बात पर
निर्भर करेगा कि मौसम का बदलाव किस समय और किस क्षेत्र में कितना होता है।
इसलिए भय या अतिरंजित दावों के बजाय वैज्ञानिक पूर्वानुमान, स्थानीय चेतावनी और व्यावहारिक तैयारी पर ध्यान देना चाहिए।
भौगोलिक और वैज्ञानिक तथ्य: एक नजर में
| विषय | प्रमुख जानकारी |
| घटना का नाम | El Niño-Southern Oscillation (ENSO) का गर्म चरण |
| प्रमुख क्षेत्र | भूमध्यरेखीय मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर |
| Niño-3.4 क्षेत्र | लगभग 5° उत्तर से 5° दक्षिण और 170° पश्चिम से 120° पश्चिम |
| मुख्य प्रक्रिया | व्यापारिक हवाओं का कमजोर होना और गर्म समुद्री जल का पूर्व की ओर फैलना |
| सामान्य मापन | समुद्र की सतह के तापमान की सामान्य से विसंगति |
| NOAA Niño-3.4, अक्टूबर 2026 | लगभग +2.1°C (मासिक/मौसमी निदान के संदर्भ में) |
| IRI साप्ताहिक Niño-3.4, 14 अक्टूबर 2026 | लगभग +3.3°C |
| NOAA का अक्टूबर-दिसंबर 2026 आकलन | 1950 के बाद ऐतिहासिक रूप से बहुत शक्तिशाली घटना की 83% संभावना |
| WMO का सितंबर 2026 आकलन | फरवरी 2027 तक बने रहने की लगभग 100% संभावना |
| भारत के लिए प्रमुख जोखिम | मानसून की अनियमितता, गर्मी, कृषि और जल प्रबंधन पर दबाव |
| आधिकारिक श्रेणी | “Super El Niño” अलग आधिकारिक श्रेणी नहीं; “Very Strong El Niño” अधिक उपयुक्त वैज्ञानिक अभिव्यक्ति |
Summary (निष्कर्ष)
2026-27 का अल नीनो घटनाक्रम दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण
जलवायु चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। NOAA और IRI के
नवीनतम अक्टूबर आकलन प्रशांत महासागर में असाधारण गर्मी और बहुत मजबूत अल नीनो की ओर संकेत करते हैं।
WMO के अनुसार यह घटना 2027 की शुरुआत तक बने रहने की प्रबल संभावना रखती है।
भारत के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू मानसून, कृषि, जल उपलब्धता और गर्मी से जुड़ा जोखिम है।
कमजोर या अनियमित बारिश से खरीफ फसलों, जलाशयों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
लेकिन अल नीनो का अर्थ अनिवार्य रूप से सूखा नहीं है। हिंद महासागर
द्विध्रुव, स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य जलवायु कारक वास्तविक परिणाम को बदल सकते हैं।
इसलिए सुपर अल नीनो को केवल एक मौसम समाचार नहीं, बल्कि कृषि योजना,
जल संरक्षण, स्वास्थ्य सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए समय रहते तैयारी का संकेत समझना चाहिए।
15 महत्वपूर्ण FAQ: सुपर अल नीनो से जुड़े सवाल और जवाब
1. सुपर अल नीनो क्या है?
सुपर अल नीनो लोकप्रिय रूप से अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो घटना के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।
इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का
समुद्री तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है और वैश्विक मौसम के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।
2. क्या सुपर अल नीनो एक आधिकारिक वैज्ञानिक नाम है?
नहीं। WMO और IMD ने “Super El Niño” को अलग आधिकारिक श्रेणी के रूप में परिभाषित नहीं किया है।
वैज्ञानिक सामान्यतः कमजोर, मध्यम, मजबूत और बहुत मजबूत अल नीनो जैसे वर्गीकरण का उपयोग करते हैं।
3. 2026-27 का अल नीनो कितना शक्तिशाली हो सकता है?
NOAA के 8 अक्टूबर 2026 के आकलन में अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान 1950 के बाद
की ऐतिहासिक रूप से बहुत शक्तिशाली घटना की संभावना 83 प्रतिशत बताई गई।
IRI के अक्टूबर आकलन में भी बहुत मजबूत अल नीनो के संकेत मिले हैं।
4. अल नीनो किस महासागर में पैदा होता है?
यह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से
में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ा है।
5. अल नीनो और ला नीना में क्या अंतर है?
अल नीनो में भूमध्यरेखीय मध्य-पूर्वी प्रशांत का समुद्री जल सामान्य से गर्म होता है,
जबकि ला नीना में यह सामान्य से ठंडा रहता है। दोनों ENSO की विपरीत जलवायु अवस्थाएं हैं।
FAQ
6. क्या सुपर अल नीनो से भारत में सूखा पड़ेगा?
यह निश्चित नहीं है। अल नीनो भारत में कमजोर मानसून की संभावना बढ़ा सकता है,
लेकिन IOD और अन्य मौसमी कारकों के कारण बारिश सामान्य भी रह सकती है
या उसका क्षेत्रीय वितरण बदल सकता है।
7. क्या 2027 का भारतीय मानसून प्रभावित हो सकता है?
हां, जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन 2027 के मानसून की वास्तविक स्थिति जानने के लिए IMD के
आधिकारिक मौसमी पूर्वानुमान और बाद के अपडेट का इंतजार करना आवश्यक है।
8. भारत की किन फसलों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है?
धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, अरहर, मूंग, उड़द और मूंगफली जैसी मानसून
पर निर्भर खरीफ फसलें वर्षा की कमी या लंबे शुष्क अंतराल से प्रभावित हो सकती हैं।
9. क्या अल नीनो से गेहूं की फसल को नुकसान हो सकता है?
यदि मानसून कमजोर होने से सिंचाई जल की उपलब्धता घटती है या
सर्दियों में असामान्य गर्मी पड़ती है, तो गेहूं प्रभावित हो सकता है।
लेकिन नुकसान स्थानीय जल उपलब्धता, तापमान और फसल प्रबंधन पर निर्भर करेगा।
10. दुनिया के किन देशों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है?
इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका के कुछ देश और मध्य अमेरिका के
कुछ हिस्से अल नीनो से जुड़ी शुष्क परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं।
FAQ
11. किन देशों में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है?
पेरू और इक्वाडोर के प्रशांत तटीय क्षेत्रों में अल नीनो के
दौरान भारी बारिश और बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
दक्षिणी ब्राजील के कुछ हिस्सों में भी कुछ घटनाओं के दौरान अधिक बारिश देखी गई है।
12. क्या सुपर अल नीनो से वैश्विक तापमान बढ़ेगा?
अल नीनो वैश्विक औसत तापमान को अस्थायी रूप से बढ़ा सकता है। यदि यह पहले से गर्म हो रही
पृथ्वी के साथ सक्रिय हो, तो कुछ क्षेत्रों में असामान्य गर्मी और तापमान के रिकॉर्ड बनने की
संभावना बढ़ सकती है।
13. क्या अल नीनो से समुद्री तूफान भी प्रभावित होते हैं?
हां। अल नीनो उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए अनुकूल या प्रतिकूल वायुमंडलीय परिस्थितियां बदल सकता है।
उदाहरण के लिए, अटलांटिक में तूफान गतिविधि पर इसका प्रभाव पड़ सकता है,
लेकिन हर तूफान का कारण अल नीनो नहीं होता।
14. किसान सुपर अल नीनो से बचाव के लिए क्या करें?
किसानों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार फसल तथा किस्म चुननी चाहिए।
वर्षा जल संचयन, मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाना, सूक्ष्म सिंचाई, उपयुक्त बीज और फसल बीमा उपयोगी उपाय हो सकते हैं।
15. सुपर अल नीनो कब तक सक्रिय रह सकता है?
WMO के 3 सितंबर 2026 के आकलन में फरवरी 2027 तक बने रहने की लगभग 100 प्रतिशत संभावना बताई गई थी।
NOAA के अक्टूबर आकलन में भी जनवरी-मार्च 2027 तक
मजबूत से बहुत मजबूत स्थिति बने रहने की संभावना अधिक बताई गई।
आगे की अवधि के लिए नए पूर्वानुमान देखना जरूरी है।
References (संदर्भ एवं स्रोत)
- World Meteorological Organization (WMO) — El Niño set to become very strong, raising risks of extreme weather into 2027, 3 September 2026.
https://wmo.int/news/media-centre/el-nino-set-become-very-strong-raising-risks-extreme-weather-2027 - NOAA Climate Prediction Center (CPC) — ENSO Diagnostic Discussion, 8 October 2026.
https://www.cpc.ncep.noaa.gov/products/analysis_monitoring/enso_advisory/ensodisc.shtml - NOAA Climate Prediction Center — Official ENSO Probabilities, October 2026.
https://cpc.ncep.noaa.gov/products/analysis_monitoring/enso/roni/probabilities/ - International Research Institute for Climate and Society (IRI), Columbia University — October 2026 ENSO Forecast, published 19 October 2026.
https://iri.columbia.edu/our-expertise/climate/forecasts/enso/current/ - भारत सरकार, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय / Press Information Bureau — Parliament Question: Impact of El Niño on Indian Monsoon, 30 July 2026.
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2291639 - India Meteorological Department (IMD) — मौसमी पूर्वानुमान, मानसून अपडेट और मौसम चेतावनियां।
https://mausam.imd.gov.in/ - Food and Agriculture Organization (FAO) — कृषि, खाद्य सुरक्षा और जलवायु जोखिम संबंधी जानकारी।
https://www.fao.org/ - IPCC — जलवायु परिवर्तन, चरम मौसम और वैश्विक जोखिम संबंधी वैज्ञानिक आकलन।
https://www.ipcc.ch/
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख WMO, NOAA, IRI, भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और IMD
सहित उपलब्ध वैज्ञानिक एवं आधिकारिक स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।
इसमें दिए गए तापमान, संभावनाएं और पूर्वानुमान संबंधित संस्थाओं द्वारा जारी
तारीख-विशेष के आकलन हैं; इन्हें स्थायी या अंतिम निष्कर्ष न माना जाए।
मौसम और जलवायु पूर्वानुमान समय के साथ बदल सकते हैं।
“सुपर अल नीनो” लोकप्रिय अभिव्यक्ति है, कोई अलग आधिकारिक वैज्ञानिक श्रेणी नहीं। भारत में सूखा,
मानसून की कमी, फसल नुकसान या किसी राज्य में विशेष
मौसम घटना को निश्चित परिणाम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
स्थानीय मौसम चेतावनी और कृषि निर्णयों के लिए IMD, राज्य कृषि
विभाग तथा अधिकृत संस्थाओं की नवीनतम सलाह को प्राथमिकता दें।
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