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नववर्ष में कुछ ऐसा कर जाएं कि अगले वर्ष हमें अपने आप पर, अपने समाज पर, अपनी मानव जाति पर गर्व हो, यदि प्रकृति इसी तरह कोप सहती रही, धरती का तापमान बढ़ता रहा, नदियां सूखती रहीं और बेमौसम बाढ़ और तूफान दस्तक देते रहे, ग्लेशियर यूं ही पिघलते रहे, महामाीरयां यू ही हमारे जीवन को तहस-नहस करती रहीं और हम शतरंज के एक मामूली प्यादे की भांति जीकर सुधार का कोई हिस्सा नहीं हो पाए।
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