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Crisis Facing Himalayan Glaciers

Crisis Facing Himalayan Glaciers 2026: हिमालय के ग्लेशियर कितनी तेजी से पीछे खिसक रहे हैं, जल संकट और GLOF का खतरा कितना बढ़ा?

Crisis Facing Himalayan Glaciers (हिमालय के ग्लेशियर पर संकट) अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत और पूरे एशिया की जल सुरक्षा, कृषि, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन से जुड़ा बड़ा प्रश्न बन चुका है। 2026 में ICIMOD की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार हिंदूकुश हिमालय (HKH) क्षेत्र के ग्लेशियर 1990 से 2020 के बीच लगभग 12% क्षेत्रफल खो चुके हैं, जबकि अनुमानित बर्फ भंडार में करीब 9% कमी आई है। 1975 के बाद कुछ क्षेत्रों में बर्फ की मोटाई का संचयी नुकसान 27 मीटर तक आंका गया है।

भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार हिंदूकुश हिमालय के ग्लेशियरों की औसत पीछे हटने की दर लगभग 14.9 मीटर प्रति वर्ष रही है। गंगा बेसिन में यह औसत 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र बेसिन में 20.2 मीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई है।

Crisis Facing Himalayan Glaciers (हिमालय के ग्लेशियर पर संकट) कितना गंभीर है?

हिमालय को एशिया का Water Tower कहा जाता है। यहां मौजूद हजारों ग्लेशियर सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र सहित कम से कम 10 प्रमुख एशियाई नदी प्रणालियों को पानी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ICIMOD के 2026 आकलन के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। इन पर लगभग दो अरब लोगों की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा किसी न किसी रूप में निर्भर है।

हिमालय के ग्लेशियर कितने पीछे खिसके हैं?

पूरे हिमालय के लिए “इतने ग्लेशियर इतने मीटर पीछे खिसक गए” जैसी एकल संख्या उपलब्ध नहीं है, क्योंकि हर ग्लेशियर की निगरानी अवधि और परिस्थितियां अलग हैं।

लेकिन उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़े संकट की व्यापकता बताते हैं। भारत सरकार के अनुसार हिंदूकुश हिमालयी ग्लेशियरों की औसत retreat rate 14.9 ± 15.1 मीटर प्रति वर्ष रही है।

नदी बेसिन/क्षेत्रऔसत ग्लेशियर पीछे हटने की दर
संपूर्ण हिंदूकुश हिमालय14.9 ± 15.1 मीटर/वर्ष
सिंधु बेसिन12.7 ± 13.2 मीटर/वर्ष
गंगा बेसिन15.5 ± 14.4 मीटर/वर्ष
ब्रह्मपुत्र बेसिन20.2 ± 19.7 मीटर/वर्ष
काराकोरमअपेक्षाकृत कम लंबाई परिवर्तन

ये आंकड़े बताते हैं कि परिवर्तन पूरे क्षेत्र में समान नहीं है।

ऐसा कौन सा ग्लेशियर है जो सबसे अधिक पीछे खिसका है?

किसी एक ग्लेशियर को पूरे हिमालय का “सबसे अधिक पीछे खिसकने वाला ग्लेशियर” घोषित करना उपलब्ध तुलनीय आंकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा।

हालांकि भारत के चंद्रा बेसिन में अध्ययन किए गए ग्लेशियरों में पिछले दशक के दौरान पीछे हटने की दर लगभग 13 से 33 मीटर प्रति वर्ष के बीच रही है। इसी बेसिन ने पिछले 20 वर्षों में अपने ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 6% खोया है।

इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से “सबसे अधिक” के बजाय क्षेत्रवार retreat rate को देखना अधिक सही है।

कौन-कौन से ग्लेशियर विशेष निगरानी में हैं?

ICIMOD के 50 वर्षों के mass-balance अध्ययन में 38 ग्लेशियरों की निगरानी के आंकड़े शामिल किए गए हैं। इनमें केवल सात ग्लेशियर विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा के benchmark मानकों को पूरा करते हैं।

इनमें भारत के Chhota Shigri और Hoksar तथा नेपाल के Mera, Pokalde, Rikha Samba, West Changri Nup और Yala शामिल हैं। ICIMOD ने Chhota Shigri को पश्चिमी हिमालय और Mera तथा Rikha Samba को मध्य हिमालय के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि ग्लेशियरों के रूप में रेखांकित किया है।

ग्लेशियर पीछे खिसकने के मुख्य कारण क्या हैं?

सबसे बड़ा क्षेत्रीय कारण जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान है। इसके साथ बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव, गर्म अवधि का बढ़ना, धूल और काला कार्बन, वर्षा में बदलाव तथा पर्वतीय अस्थिरता भी भूमिका निभा सकते हैं।

ICIMOD के अनुसार 2000 के बाद हिमालयी ग्लेशियरों का wastage लगभग दोगुना हुआ है। 1974–2023 में 38 monitored glaciers में औसत mass loss लगभग 0.62 मीटर water equivalent प्रति वर्ष रहा, जबकि 2000 के बाद यह लगभग 0.66 मीटर रहा।

Climate Change के कारण संकट क्यों बढ़ रहा है?

हिंदूकुश हिमालय के लगभग 78% glacier area 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित है और elevation-dependent warming से विशेष रूप से प्रभावित है। 1990–2020 के दौरान पूरे HKH में glacier area करीब 12% घटा। पूर्वी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में तीन दशकों में glacier area loss 33% तक दर्ज किया गया।

यह बताता है कि जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों के प्राकृतिक संतुलन को बदल रहा है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान क्या हो रहा है?

ग्लेशियरों का पीछे हटना तीन स्तरों पर चिंता पैदा करता है।

पहला—जल सुरक्षा। शुरुआती समय में तेज पिघलाव से कुछ नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में glacier mass घटने से गर्मियों और शुष्क मौसम के river flow पर दबाव बढ़ सकता है।

दूसरा—आपदा जोखिम। पीछे हटते ग्लेशियरों के सामने नई या बड़ी ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं।

तीसरा—कृषि और ऊर्जा। सिंचाई, जलविद्युत और पर्वतीय समुदायों की जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

भारत में किन हिस्सों को नुकसान हो सकता है?

भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं—

  • लद्दाख और जम्मू-कश्मीर
  • हिमाचल प्रदेश
  • उत्तराखंड
  • सिक्किम
  • अरुणाचल प्रदेश

इन क्षेत्रों से निकलने वाली नदियां नीचे के मैदानी इलाकों की जल व्यवस्था से जुड़ी हैं।

भारत सरकार के अनुसार चंद्रा बेसिन में पिछले 20 वर्षों में glacier area में लगभग 6% कमी आई है। वहीं सिक्किम में South Lhonak और Shako Cho जैसी ग्लेशियल झीलों की real-time monitoring भी की जा रही है।

क्या ग्लेशियरों के पीछे हटने से बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है?

हां, कुछ परिस्थितियों में।

ग्लेशियर के पीछे हटने से बनी या विस्तारित Glacial Lakes यदि प्राकृतिक बांध टूटने से अचानक पानी छोड़ दें तो Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF हो सकता है।

ISRO के 1984–2023 satellite analysis में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलें पहचानी गईं। इनमें 676 झीलों का विस्तार हुआ था। भारत में ऐसी 130 विस्तारित झीलें इंडस, गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में दर्ज की गईं।

कौन सी ग्लेशियल झील तेजी से बढ़ी है?

ISRO के अनुसार हिमाचल प्रदेश में Ghepang Ghat glacial lake का आकार 1989 से 2022 के बीच 178% बढ़ा, जो 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हुआ। यह लगभग 4,068 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

यह उदाहरण दिखाता है कि glacier retreat और glacial-lake expansion को साथ-साथ देखना क्यों जरूरी है।

भविष्य में कौन-कौन से संकट आ सकते हैं?

हिमालयी ग्लेशियरों में लगातार बदलाव के कारण आने वाले दशकों में कई प्रकार के जोखिम बढ़ सकते हैं—

  1. Glacial Lake Outburst Flood (GLOF)
  2. अचानक बाढ़ और debris flow
  3. हिमस्खलन और ice-rock avalanche
  4. पर्वतीय भूस्खलन
  5. नदी प्रवाह में अनिश्चितता
  6. दीर्घकालीन जल उपलब्धता में कमी
  7. कृषि सिंचाई पर दबाव
  8. जलविद्युत परियोजनाओं के लिए जोखिम
  9. पर्वतीय बस्तियों और सड़कों को नुकसान
  10. सीमा-पार नदी प्रबंधन की नई चुनौतियां

ICIMOD की अगस्त 2026 की Regional Cryosphere Strategy के अनुसार glacier loss, बदलते snow patterns और permafrost degradation के साथ GLOF, avalanche, debris flow और landslide जैसे जोखिम भी बढ़ती चिंता का विषय हैं।

यह संकट कितने वर्षों में बढ़ा है?

यह अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। वैज्ञानिक रिकॉर्ड इसे कई दशकों का बदलाव बताते हैं।

1974 से 2023 तक की लगभग 50 वर्ष की mass-balance निगरानी में 38 ग्लेशियरों में औसत cumulative mass loss लगभग 23.95 मीटर water equivalent दर्ज हुआ। 2000 के बाद wastage की दर पहले की तुलना में लगभग दोगुनी रही।

इसलिए हिमालयी ग्लेशियर संकट को एक-दो वर्ष की घटना नहीं, बल्कि दशकों से तेज होते जलवायु परिवर्तन का परिणाम समझना चाहिए।

क्या हिमालय के ग्लेशियरों को बचाया जा सकता है?

ग्लेशियरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालीन उपाय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है। इसके साथ तत्काल adaptation भी जरूरी है।

भारत और अन्य हिमालयी देशों के लिए satellite monitoring, field observations, glacial-lake mapping, early-warning systems, सुरक्षित पर्वतीय निर्माण और साझा नदी-बेसिन डेटा महत्वपूर्ण हैं।

भारत में NDMA का National GLOF Risk Mitigation Programme हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में जोखिम कम करने और early-warning क्षमता मजबूत करने पर काम कर रहा है।

हिमालयी ग्लेशियरों की भौगोलिक स्थिति और संकट

भौगोलिक क्षेत्रप्रमुख ग्लेशियर/क्षेत्रप्रमुख समस्यासंभावित प्रभाव
जम्मू-कश्मीर/लद्दाखसियाचिन, कोलाहोई क्षेत्रmass lossजल व पर्वतीय जोखिम
हिमाचल प्रदेशचोता शिगरी, बड़ा शिगरी, चंद्रा बेसिनretreatजल प्रवाह/GLOF
उत्तराखंडगंगोत्री, चोराबारी आदिretreat एवं lake riskगंगा बेसिन जोखिम
सिक्किमSouth Lhonak क्षेत्रglacial-lake riskGLOF
अरुणाचल प्रदेशपूर्वी हिमालयतेज cryosphere परिवर्तनबाढ़/भूस्खलन
नेपालMera, Yala, Rikha Samba आदिmass lossजल एवं पर्वतीय जोखिम
पूर्वी HKHHengduan Shan आदिarea lossजल उपलब्धता/आपदा
काराकोरमबड़े glacier systemsअलग क्षेत्रीय व्यवहारदीर्घकालीन जल जोखिम

Summary: हिमालय के ग्लेशियरों पर संकट का भविष्य क्या कहता है?

Crisis Facing Himalayan Glaciers अब वैज्ञानिक चेतावनी से आगे बढ़कर जल, खाद्य और आपदा सुरक्षा का विषय बन चुका है।

1990–2020 के बीच HKH glacier area में लगभग 12% कमी, ice reserves में लगभग 9% कमी और 1975 के बाद कुछ क्षेत्रों में 27 मीटर तक ice-thickness loss दर्ज होना संकट की गंभीरता दिखाता है।

भारत में औसत glacier retreat लगभग 14.9 मीटर प्रति वर्ष है, लेकिन अलग-अलग बेसिनों में यह दर काफी अलग है। इसलिए किसी एक ग्लेशियर को पूरे हिमालय का “सबसे तेज पीछे हटने वाला” बताने के बजाय क्षेत्रीय वैज्ञानिक आंकड़ों को देखना अधिक उचित है।

आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती केवल ग्लेशियरों का पिघलना नहीं होगी, बल्कि जल उपलब्धता में बदलाव और अचानक पर्वतीय आपदाओं के बढ़ते जोखिम को साथ-साथ समझना होगी।

FAQ: Crisis Facing Himalayan Glaciers

हिमालय के ग्लेशियर कितनी तेजी से पीछे हट रहे हैं?

भारत सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार HKH ग्लेशियरों की औसत retreat rate करीब 14.9 मीटर प्रति वर्ष है। गंगा बेसिन में यह लगभग 15.5 और ब्रह्मपुत्र बेसिन में 20.2 मीटर प्रति वर्ष है।

क्या पूरे हिमालय का सबसे तेजी से पीछे हटने वाला एक ग्लेशियर है?

उपलब्ध तुलनीय आंकड़ों से पूरे हिमालय के लिए किसी एक ग्लेशियर को विश्वसनीय रूप से नंबर-1 बताना उचित नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में retreat rates अलग हैं।

हिमालय के ग्लेशियर कब से तेजी से पिघल रहे हैं?

वैज्ञानिक रिकॉर्ड कई दशकों का बदलाव दिखाता है। 1974–2023 की निगरानी में mass loss दर्ज हुआ और 2000 के बाद wastage की दर पहले की तुलना में लगभग दोगुनी रही।

क्या Climate Change हिमालयी ग्लेशियर संकट का मुख्य कारण है?

बढ़ता तापमान और climate change इस व्यापक बदलाव के प्रमुख drivers में हैं। स्थानीय मौसम, बर्फबारी, धूल, काला कार्बन और स्थलाकृति भी ग्लेशियर की प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं।

FAQ

क्या ग्लेशियर पिघलने से भारत में बाढ़ आ सकती है?

कुछ परिस्थितियों में ग्लेशियल झील के प्राकृतिक बांध टूटने से GLOF हो सकता है। इसलिए glacier retreat के साथ glacial-lake monitoring भी जरूरी है।

भारत में कौन से क्षेत्र अधिक संवेदनशील हैं?

लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश प्रमुख हिमालयी क्षेत्र हैं जहां glacier और glacial-lake hazards की निगरानी महत्वपूर्ण है।

हिमालय के ग्लेशियरों से कितने लोग प्रभावित हो सकते हैं?

HKH glaciers कम से कम 10 प्रमुख एशियाई river systems से जुड़े हैं और लगभग दो अरब लोगों की water, food और energy security में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

क्या ग्लेशियरों को फिर से पहले जैसा बनाया जा सकता है?

ग्लेशियरों के प्राकृतिक रूप से सिकुड़ने को तत्काल उलटना संभव नहीं है। लेकिन greenhouse-gas emissions में कमी, climate adaptation, monitoring और disaster preparedness से भविष्य के नुकसान और जोखिम को कम किया जा सकता है।

References

  1. ICIMOD, Changing Dynamics of Glaciers in the Hindu Kush Himalaya Region from 1990 to 2020, 2026.
  2. ICIMOD, HKH Glacier Outlook 2026: Insights from 50 Years of Himalayan Glacier Monitoring.
  3. Government of India, Ministry of Earth Sciences/PIB, Strategy on Glacier and Climate Protection.
  4. ISRO, Satellite Insights: Expanding Glacial Lakes in the Indian Himalayas.
  5. ICIMOD, Regional Cryosphere Strategy for the Hindu Kush Himalaya, 2026.
Disclaimer

यह लेख उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों, satellite observations और भारत सरकार/ICIMOD जैसे संस्थानों के प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है। अलग-अलग ग्लेशियरों की स्थिति, retreat rate और mass balance अलग हो सकते हैं। किसी विशेष ग्लेशियर या ग्लेशियल झील के स्थानीय खतरे का आकलन नवीनतम satellite data, field observations और संबंधित सरकारी एजेंसियों की चेतावनियों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

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