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Himalayan Glaciers

Himalayan Glaciers 2026: हिमालय के ग्लेशियर कौन-कौन से हैं, कौन संकट में हैं, ताजा स्टडी क्या कहती है और नेपाल की जल आपदा का क्या संबंध है?

Himalayan Glaciers (हिमालय के ग्लेशियर) एशिया की जल सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन्हें अक्सर “एशिया के वाटर टावर्स” कहा जाता है, क्योंकि हिमालय और हिंदूकुश क्षेत्र की बर्फ और ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र सहित कई बड़ी नदी प्रणालियों को पोषण देता है। लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि इस क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

मार्च 2026 में जारी ICIMOD के आकलन के अनुसार 1990 से 2020 के बीच हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल लगभग 12% घटा और बर्फ के अनुमानित भंडार में करीब 9% कमी आई। 2000 के बाद ग्लेशियरों की बर्फ खोने की दर और तेज हुई है।

यह बदलाव केवल भविष्य की जल समस्या नहीं है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से नई और बड़ी ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं, जिनसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF का खतरा बढ़ता है। अगस्त 2026 में नेपाल के रासुवा क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ ने इसी व्यापक खतरे की ओर फिर ध्यान खींचा है।

Himalayan Glaciers (हिमालय के ग्लेशियर) कौन-कौन से हैं?

हिमालय और हिंदूकुश क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर हैं। भारत में प्रमुख ग्लेशियरों में गंगोत्री, यमुनोत्री, सियाचिन, चतरा/चोता शिगरी, बड़ा शिगरी, पेनसिलुंगपा, कोलाहोई, डोकरीयानी, चोराबारी, समुंद्र टापू, गेफांग गाथ और स्टोक जैसे ग्लेशियर शामिल हैं।

नेपाल में खुम्बू, याला, मेला, रिक्हा सांबा और वेस्ट चांगरी नुप जैसे ग्लेशियर वैज्ञानिक निगरानी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

ICIMOD के 2026 के क्षेत्रीय आकलन के अनुसार पूरे हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर दर्ज हैं, जो करीब 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं।

इसमें प्रमुख तौर पर कौन से ग्लेशियर हैं?

कुछ ग्लेशियर अपने आकार, नदी प्रणालियों, वैज्ञानिक निगरानी या जल संसाधन के कारण विशेष महत्व रखते हैं।

गंगोत्री ग्लेशियर भागीरथी नदी के ऊपरी क्षेत्र से जुड़ा है और इसलिए गंगा प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है। गंगोत्री क्षेत्र में लगातार वैज्ञानिक निगरानी की जा रही है और उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण 2026 में भी WIHG की monitoring reports प्रकाशित कर रहा है।

चोता शिगरी ग्लेशियर हिमाचल प्रदेश के चंद्रा बेसिन में स्थित महत्वपूर्ण निगरानी ग्लेशियरों में है।

सियाचिन ग्लेशियर काराकोरम क्षेत्र में स्थित है और रणनीतिक तथा भौगोलिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

बड़ा शिगरी हिमाचल प्रदेश के प्रमुख ग्लेशियरों में से है और चंद्रा नदी प्रणाली से जुड़ा है।

कौन-कौन से ग्लेशियर संकट में हैं?

वर्तमान वैज्ञानिक तस्वीर में किसी एक ग्लेशियर को “सबसे संकटग्रस्त” घोषित करना सरल नहीं है। अलग-अलग ग्लेशियरों पर तापमान, ऊंचाई, वर्षा, मलबे की परत, ढलान और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों का अलग प्रभाव पड़ता है।

भारत सरकार के उपलब्ध आंकड़ों में कई हिमालयी ग्लेशियरों में नकारात्मक mass balance दर्ज किया गया है। उदाहरण के लिए कोलाहोई, होक्सर, स्टोक, पेनसिलुंगपा, चोता शिगरी, बड़ा शिगरी, गेफांग गाथ और चोराबारी जैसे ग्लेशियरों में संबंधित निगरानी अवधियों में mass loss दर्ज हुआ है।

ICIMOD की 2026 रिपोर्ट विशेष रूप से 0.5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियरों को अधिक तेजी से सिकुड़ने वाले समूह के रूप में रेखांकित करती है। लगभग तीन-चौथाई ग्लेशियर इसी छोटे आकार के वर्ग में आते हैं।

सबसे अधिक संकट की स्थिति में कौन से ग्लेशियर देखे जा रहे हैं?

वैज्ञानिकों के लिए “संकट” केवल ग्लेशियर की लंबाई कम होने से निर्धारित नहीं होता। mass balance, area loss, ice thickness, glacier velocity, meltwater और आसपास की glacial lakes सभी संकेत महत्वपूर्ण हैं।

2026 के ICIMOD अध्ययन में Mera और Rikha Samba को मध्य हिमालय के प्रतिनिधि निगरानी ग्लेशियरों और Chhota Shigri को पश्चिमी हिमालय के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि ग्लेशियर के रूप में बताया गया है। इसके अलावा Hoksar, Pokalde, West Changri Nup और Yala भी लंबे समय तक निगरानी वाले benchmark glaciers में शामिल हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि ये ही “सबसे खराब स्थिति” वाले ग्लेशियर हैं, बल्कि इनका लंबे समय से उपलब्ध डेटा पूरे क्षेत्र में बदलाव समझने में उपयोगी है।

हिमालय के ग्लेशियरों पर ताजा स्टडी क्या कहती है?

2026 में ICIMOD द्वारा प्रकाशित दो बड़े आकलन इस समय सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय अध्ययनों में हैं। 1990–2020 के विश्लेषण में हिंदूकुश हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में लगभग 12% कमी और अनुमानित ice reserves में करीब 9% कमी मिली। 1975 से अब तक कुछ स्थानों पर बर्फ की मोटाई का संचयी नुकसान 27 मीटर तक पहुंचने का आकलन किया गया है।

दूसरे अध्ययन में 1974–2023 के दौरान 38 monitored glaciers के औसत mass loss को लगभग 0.62 मीटर water equivalent प्रति वर्ष बताया गया है। 2000 के बाद wastage की औसत दर लगभग 0.66 मीटर water equivalent प्रति वर्ष रही, जबकि 2000 से पहले यह करीब 0.31 मीटर थी।

क्या हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं?

हां, क्षेत्रीय वैज्ञानिक आंकड़े स्पष्ट रूप से accelerated mass loss की ओर संकेत करते हैं। भारत सरकार के 2025 में संसद में दिए आंकड़ों के अनुसार हिंदूकुश हिमालय के ग्लेशियरों की औसत retreat rate लगभग 14.9 ± 15.1 मीटर प्रति वर्ष आंकी गई थी। नदी बेसिन के आधार पर यह दर अलग-अलग रही—इंडस में करीब 12.7, गंगा में 15.5 और ब्रह्मपुत्र बेसिन में 20.2 मीटर प्रति वर्ष।

लेकिन हर ग्लेशियर एक समान गति से नहीं पिघलता। काराकोरम के कुछ ग्लेशियरों में लंबाई परिवर्तन अपेक्षाकृत कम पाया गया है।

ग्लेशियर पर संकट के मुख्य कारण क्या हैं?

सबसे महत्वपूर्ण कारण बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन है। इसके साथ कई स्थानीय कारक संकट को बढ़ा सकते हैं—

  • तापमान में वृद्धि
  • बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव
  • गर्म मौसम की लंबी अवधि
  • ग्लेशियर की सतह पर धूल और काला कार्बन
  • असामान्य वर्षा
  • हिमस्खलन और rockfall
  • ग्लेशियर के पीछे बनने वाली झीलें
  • पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता मानवीय दबाव

ICIMOD के अनुसार HKH में glacier mass loss, बदलते snow patterns और permafrost degradation के साथ river flows भी अधिक अनिश्चित हो रहे हैं।

क्या ग्लेशियर पिघलने से नई जल आपदा पैदा हो सकती है?

हां। ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई जगह glacial lakes बनती या बड़ी होती हैं। यदि ऐसी झील को रोकने वाला प्राकृतिक moraine या ice dam टूट जाए तो अचानक लाखों घन मीटर पानी नीचे की ओर जा सकता है।

ISRO के 1984–2023 के satellite analysis में भारतीय हिमालयी नदी बेसिनों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 glacial lakes की पहचान की गई थी। इनमें 676 झीलों का विस्तार पाया गया। इनमें 130 भारत के भीतर थीं।

यही GLOF का बड़ा खतरा है।

नेपाल में आई 2026 की आपदा क्या किसी ग्लेशियर के कारण हुई थी?

यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है।

26 अगस्त 2026 को नेपाल के रासुवा क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ को सीधे किसी एक ग्लेशियर के पिघलने से हुई आपदा कहना अभी सही नहीं है।

ICIMOD और सहयोगी वैज्ञानिक संस्थाएं इस घटना की जांच कर रही हैं। प्रारंभिक आकलन में ऊंचाई वाले क्षेत्र से ice-rock avalanche के ल्हेंदे/लेंडे खोला में गिरने और उसके बाद पानी, मलबे तथा बड़े पत्थरों की अचानक नीचे की ओर बढ़ी लहर की संभावना सामने आई है। वैज्ञानिक अभी घटना की पूरी causal chain की जांच कर रहे हैं।

अर्थात यह घटना ग्लेशियर और cryosphere hazards से जुड़ी हो सकती है, लेकिन इसे किसी एक ग्लेशियर के “पिघलने से टूटा बांध” कहना अभी उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों से अधिक दावा होगा।

क्या नेपाल जैसी जल आपदा दोबारा आ सकती है?

हां, जोखिम मौजूद है, लेकिन किसी विशेष तारीख या स्थान पर ऐसी आपदा की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

2026 में प्रकाशित Nepal और transboundary catchments के glacial-lake dataset में 2017–2024 के दौरान हजारों lakes का satellite-based mapping किया गया। अध्ययन में पाया गया कि glacial lakes की संख्या और कुल क्षेत्रफल बढ़ा है, विशेष रूप से Koshi basin में विस्तार उल्लेखनीय है।

नेपाल के 2024 Thame GLOF के अध्ययन में भी rock avalanche द्वारा glacial lake में displacement wave पैदा होने और लगभग 156,000 घन मीटर पानी के अचानक निकलने की पुष्टि हुई थी।

इसलिए भविष्य में GLOF, ice-rock avalanche, landslide-dam failure और extreme rainfall जैसी घटनाओं का संयुक्त जोखिम गंभीरता से लेना आवश्यक है।

हिमालयी ग्लेशियरों को बचाने और जोखिम कम करने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

भारत, नेपाल और अन्य हिमालयी देशों में satellite monitoring, field observations, glacial lake inventories और early-warning systems पर काम हो रहा है।

भारत में ISRO remote sensing और GIS के जरिए glacier तथा glacial-lake monitoring करता है। Central Water Commission 10 हेक्टेयर से बड़े 902 glacial lakes and water bodies की निगरानी करता है।

2026 में ICIMOD ने पूरे HKH के लिए एक Regional Cryosphere Strategy भी प्रस्तुत की है, जिसमें standardized monitoring, regional capacity building, साझा data infrastructure और विज्ञान को disaster preparedness तथा water-energy planning से जोड़ने पर जोर है।

Himalayan Glaciers: प्रमुख भौगोलिक और वैज्ञानिक तथ्य

क्षेत्र/ग्लेशियरसंबंधित बेसिन/क्षेत्रप्रमुख महत्वप्रमुख चिंता
गंगोत्रीभागीरथी/गंगागंगा जल प्रणालीretreat और mass loss
चोता शिगरीचंद्रा/सिंधुbenchmark monitoringलगातार mass loss
बड़ा शिगरीचंद्राप्रमुख हिमाचली ग्लेशियरice loss
कोलाहोईझेलम/सिंधुकश्मीर की जल प्रणालीनकारात्मक mass balance
स्टोकसिंधु/लद्दाखशुष्क उच्च हिमालयmass loss
पेनसिलुंगपासुरु/सिंधुलद्दाख क्षेत्रmass loss
Meraनेपालbenchmark glacierदीर्घकालीन monitoring
Yalaनेपालbenchmark glaciermass loss
Rikha Sambaनेपालमध्य हिमालय का प्रतिनिधिaccelerated wastage
South Lhonak क्षेत्रसिक्किमGLOF risk monitoringglacial-lake hazard

क्या हिमालय के ग्लेशियरों का संकट केवल पानी की समस्या है?

नहीं। यह पानी, खेती, ऊर्जा, जैव विविधता, आपदा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है।

शुरुआती दौर में अधिक पिघलाव से कुछ नदी प्रणालियों में पानी बढ़ सकता है। लेकिन लंबे समय में glacier mass कम होने पर “peak water” के बाद कुछ क्षेत्रों में dry-season river flow घटने का खतरा बढ़ सकता है।

इसलिए वैज्ञानिकों के लिए चुनौती केवल ग्लेशियर बचाना नहीं, बल्कि बदलते glacier-water system के अनुरूप जल प्रबंधन और आपदा तैयारी करना भी है।

Summary: हिमालय के ग्लेशियरों का भविष्य क्या कहता है?

2026 के वैज्ञानिक अध्ययन एक स्पष्ट संकेत देते हैं—हिमालयी cryosphere तेजी से बदल रहा है।

ग्लेशियरों का क्षेत्रफल और mass घट रहा है, छोटी glacier units अधिक तेजी से सिकुड़ रही हैं और कई glacial lakes का विस्तार हो रहा है। इससे एक ओर भविष्य की जल उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है, तो दूसरी ओर GLOF और अन्य mountain hazards का जोखिम भी बढ़ सकता है।

नेपाल की अगस्त 2026 की आपदा इस बदलते जोखिम का महत्वपूर्ण उदाहरण है, लेकिन उसे किसी एक ग्लेशियर के पिघलने का सीधा परिणाम कहना अभी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। वास्तविक समाधान है—सतत glacier monitoring, glacial-lake early warning, cross-border data sharing, सुरक्षित पर्वतीय निर्माण और greenhouse-gas emissions में कमी।

हिमालय केवल बर्फ का पहाड़ नहीं है। यह करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा का आधार है।

FAQ: Himalayan Glaciers से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

हिमालय में कितने ग्लेशियर हैं?

पूरे हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक glaciers का inventory उपलब्ध है।

भारत के प्रमुख हिमालयी ग्लेशियर कौन से हैं?

गंगोत्री, सियाचिन, चोता शिगरी, बड़ा शिगरी, कोलाहोई, स्टोक, पेनसिलुंगपा, चोराबारी और डोकरीयानी प्रमुख नामों में शामिल हैं।

क्या सभी हिमालयी ग्लेशियर समान गति से पिघल रहे हैं?

नहीं। ग्लेशियरों की स्थिति ऊंचाई, जलवायु, ढलान, मलबे और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग है।

क्या ग्लेशियर पिघलने से बाढ़ आ सकती है?

ग्लेशियर meltwater से बनी या विस्तारित glacial lakes के प्राकृतिक बांध टूटने पर GLOF हो सकता है।

क्या नेपाल की 2026 की बाढ़ ग्लेशियर पिघलने से हुई?

अभी ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। ICIMOD की प्रारंभिक जांच में ice-rock avalanche और उससे उत्पन्न अचानक flood wave की संभावना सामने आई है।

क्या हिमालय में फिर GLOF हो सकता है?

जोखिम मौजूद है। बढ़ती glacial lakes, glacier retreat और पर्वतीय अस्थिरता के कारण monitoring और early-warning systems जरूरी हैं।

हिमालय के ग्लेशियरों को बचाने का सबसे महत्वपूर्ण उपाय क्या है?

दीर्घकाल में greenhouse-gas emissions कम करना आवश्यक है। साथ ही glacier monitoring, glacial-lake risk assessment, early warning और climate-resilient adaptation तत्काल जरूरी हैं।

References

  1. ICIMOD — Changing Dynamics of Glaciers in the Hindu Kush Himalaya Region from 1990 to 2020.
  2. ICIMOD — HKH Glacier Outlook 2026.
  3. ICIMOD — Fifty Years of Himalayan Glacier Mass-Balance Monitoring.
  4. ISRO — Satellite Insights: Expanding Glacial Lakes in the Indian Himalayas.
  5. Government of India, Ministry of Earth Sciences — Himalayan glacier monitoring data.
  6. ICIMOD — Nepal Rasuwa flash-flood assessment, August 2026.
  7. Earth System Science Data — Glacial Lake Observatory: Nepal and transboundary catchments, 2017–2024.
Disclaimer

यह लेख उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों, सरकारी आंकड़ों और संस्थागत आकलनों के आधार पर तैयार किया गया है।

ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की स्थिति लगातार बदलती रहती है।

किसी विशेष ग्लेशियर या झील को लेकर स्थानीय खतरे का आकलन नवीनतम satellite data, field observations

और संबंधित सरकारी एजेंसियों की चेतावनी के आधार पर किया जाना चाहिए। ने

पाल की 2026 की आपदा के कारणों से संबंधित वैज्ञानिक जांच अभी जारी हो सकती है; इसलिए

प्रारंभिक निष्कर्षों को अंतिम कारण के रूप में नहीं समझना चाहिए।

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