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कहा जा सकता है कि पहाड़ भी नारियल की तरह होते हैं, बाहर से सख्त और अंदर से बेहद सरल, सहज और ईमानदार। यदि यह तर्क हम इस तरह समझें कि पहाड़ यदि अंदर से विनम्र नहीं होते तो क्या सबसे अधिक खूबसूरती पहाड़ों पर होती ? क्या कारण है कि पहाड सख्त होने के बावजूद खूबसूरती और प्रकृति को अपने गहरे उतरने की अनुमति देते हैं? सोचिएगा अवश्य क्योंकि यह कोरे तर्क का नहीं चिंतन और कार्य में जुटने का वक्त है, ऐसे समय जबकि पर्यावरण चहुंतरफा आहत हो रहा है, न वायु ठीक है, न जल स्वच्छ है, न ही मौसम में पूर्व की भांति लयात्मकता है, न ही तापमान घट रहा है, न ही मनमाफिक बारिश हो रही है और न ही जमीन की उर्वरा शक्ति पूर्व की भांति मजबूत रह पाई है।
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